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अरुणाचल तक पहुंची चीन की रेल लाइन, भारत के लिए क्यों है चिंता की वजह?


Tibet से जो सीमा भारत के साथ सटी है, यानी अरुणाचल प्रदेश तक पहुंचने वाले सीमांत इलाकों तक China निर्माण तेज़ रफ़्तार से कर रहा है. दूसरी तरफ, समृद्ध चीनी इलाकों के लोगों को Arunachal Border से सटे तिब्बत के दूरस्थ इलाकों में रणनीतिक निवेश (Investment) करने के लिए भी चीन प्रोत्साहित कर रहा है. ऐसी ही कोशिशों का नतीजा है कि चीन की एक महत्वपूर्ण Railway Line अरुणाचल की सीमा के बहुत नज़दीक पहुंच चुकी है.

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हाल ही, न्यूज़18 ने बताया था कि कैसे सैटेलाइट चित्रों से खुलासा हुआ था कि चीन Galwan Valley में गलवान नदी की संरचना से छेड़छाड़ कर Ladakh की सीमा के पास किस तरह ज़ोरों पर निर्माण कर रहा है. अब जानिए कि अरुणाचल के सीमावर्ती इलाकों पर चीन के निर्माण का सामरिक और रणनीतिक महत्व क्या और कितना है.

पिछले दिनों पीएम मोदी ने कहा कि LAC पर अब इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो गया है. फाइल फोटो.

ल्हासा-लिंझी रेल लाइन है बड़ी चाल!
चीन ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर जो ब्रिज पूरा कर लिया है, वह अस्ल में 435 किलोमीटर लंबी ल्हासा-नियिंगची (लिंझी) रेलवे प्रोजेक्ट का ही हिस्सा है, जो ​दक्षिण पश्चिम चीन के तिब्बत क्षेत्र (TAR) में बनाया जा रहा है. विशेषज्ञों के हवाले से खबरें हैं कि एक बार यह निर्माण पूरा हो गया तो इसका इस्तेमाल नागरिकों के साथ ही सेना की आवाजाही के लिए भी होगा. यह रेल लाइन और ब्रिज अरुणाचल की सीमा के बेहद करीब और समानांतर है क्योंकि चीन अरुणाचल को तिब्बत का ही दक्षिण हिस्सा मानकर उस पर दावा करता है.

क्या है ल्हासा-लिंझी रेल प्रोजेक्ट?
अरुणाचल के उत्तरी हिस्से को छूते हुए गुज़रने वाले इस प्रोजेक्ट की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है. सामरिक रूप से अहम होने के साथ ही कहा जा रहा है कि यहां रेल नेटवर्क चीन के निर्माण के लिए सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट रहा है. ब्रिज से पहले मार्च और अप्रैल के बीच 11.5 किमी लंबी मै​नलिंग सुरंग का निर्माण पूरा हुआ था. ल्हासा-लिंझी रेल प्रोजेक्ट में चीन ने पिछले कुछ महीनों से करीब 2000 कामगारों को झोंक रखा है.

तिब्बत में यह पहला प्रोजेक्ट है, जहां बिजली की ट्रेन चलेगी. यही नहीं, ट्रेन की रफ्तार 160 प्रति घंटे तक हो सके, इस तरह का डिज़ाइन तैयार किया गया है. कोरोना के संकट के दौरान भी यहां काम की रफ्तार ज़्यादा ढीली नहीं पड़ने दी गई. इसके दो कारण थे, खबरों की मानें तो चीन इस प्रोजेक्ट पर करीब 4 अरब डॉलर खर्च कर चुका है, जिसे 2021 तक हर हाल में शुरू करना चाहता है. और फिर भारत के साथ सीमा विवाद के चलते चीन जल्द अपनी स्थिति मज़बूत करना चाहता है.

कितना करामाती है ल्हासा-लिंझी रेल प्रोजेक्ट?
बीते 7 अप्रैल को चीनी मीडिया ने बताया था कि 435 किमी लंबी इस रेलवे लाइन के बीच 47 में से सिर्फ दो सुरंगों का काम बाकी है. इस पूरी रेल लाइन का 75 फीसदी हिस्सा पुलों और सुरंगों में है. 90 फीसदी हिस्सा तिब्बत के मुश्किल भौगोलिक पठारों पर बनाया जा रहा है यानी समुद्र तल से 15 हज़ार फीट की ऊंचाई तक. 2021 में ऑपरेशनल होने जा रही इस ​रेल लाइन पर 2014 से 20 हज़ार से ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं.

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TibetanReview.Net से साभार लिये गए ​इस चित्र में आप ल्हासा से नियिंगची तक का रेल रूट और अरुणाचल बॉर्डर के पास उसकी स्थिति देख सकते हैं.

इस इलाके में चीन क्यों कर रहा है इतना निर्माण?
नियिंगची से जुड़ने वाले TAR इलाकों में चीन पहले ही राजमार्गों का नेटवर्क बिछा चुका है. 2018 में, 409 किमी लंबा एक्सप्रेस वे शुरू किया गया था. इस हाईवे से ल्हासा से नियिंगची के बीच सफर का समय पांच घंटे तक कम हुआ है. तिब्बत क्षेत्र में हवाई सेवाओं का विस्तार भी ज़ोरों पर है. 2019 के आखिर तक यहां पांच एयरपोर्ट से 11 एयरलाइनों की उड़ानों से तिब्बत 51 शहरों के साथ सीधे कनेक्टेड था.

नियिंगची जैसे बॉर्डर इलाकों में निवेश के लिए चीनी अमीरों को प्रोत्साहित कर चीन यहां व्यापक नीति के तहत पकड़ मज़बूत करने में लगा है. दो हफ्तों से पहले तक की स्थिति ये थी कि इस इलाके में लोक सेवाओं, पर्यटन और इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी करीब 26 कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट चालू हो चुके हैं. साल 2020 के लिए चीन के निर्माण सेक्टर के पावरहाउस कहे जाने वाले गुआंगडोंग ने नियिंगची में 51 प्रोजेक्ट की योजना बताई है.

रेल लाइन के बड़े विस्तार की रणनीति
ल्हासा-नियिंगची रेल लाइन के ऑपरेशनल होने के बाद चीन इसे सिचुआन और युनान क्षेत्रों तक विस्तार देने की रणनीति पर भी ​सोच रहा है. ऐसा होने से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के युनान के 14 ग्रुप आर्मी और सिचुआन के 13 ग्रुप आर्मी के भारी भरकम दलों को बॉर्डर तक मूवमेंट में बहुत आसानी हो जाएगी.

इसके अलावा, सिचुआन से तिब्बत तक एक अन्य रेलवे लाइन के लिए भी चीन योजना बना रहा है, जो 1700 किलोमीटर लंबी हो सकती है और अरुणाचल प्रदेश के बॉर्डर को छू सकती है. ओआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक इसके पूरे होने की समय सीमा 2026 बताई गई है. इसके साथ ही इस इलाके में हैलिपेड, एयरबेस और एयरपोर्टों को लेकर भी भारत को चिंतित होने की ज़रूरत है.

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भारतीय बॉर्डर तक चीन एक और लंबी रेलवे लाइन की योजना बना रहा है. फाइल फोटो.

भारत की क्या स्थिति है?
अरुणाचल बॉर्डर पर निर्माण के मामले में भारत स्पष्ट रूप से पिछड़ा नज़र आ रहा है. असम में मुरकोंगसेलेक से अरुणाचल में पासीघाट के बीच करीब 26 किलोमीटर का रेलवे प्रोजेक्ट सालों से लटका रहा. 2012 में मंज़ूर हुआ यह प्रोजेक्ट 2017 तक ज़मीन के अधिग्रहण न होने के कारण लटका था. फिर किसी तरह करीब 9 किमी हिस्से का अधिग्रहण हो सका, लेकिन उसके बाद से फिर यह काम अटका पड़ा है.

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अगर यह प्रोजेक्ट पूरा हो भी गया तो भी अरुणाचल तक भारतीय रेल लाइन पहुंचेगी लेकिन पासीघाट की लोकेशन अरुणाचल से लगने वाले चीन बॉर्डर से करीब 300 किमी से ज़्यादा है. इस निर्माण से भारत को मदद तो मिलेगी लेकिन उतनी बढ़त नहीं, जितनी चीन ने हासिल कर ली है. एक तरफ चीन का रेल नेटवर्क अरुणाचल की सीमा से कुछ ही दूरी तक पहुंच चुका है, वहीं भारत का रेल नेटवर्क सीमा से काफी पीछे है.

गौरतलब है कि बीते 15 जून भारत चीन फेसऑफ में चीनी हमले में 20 भारतीय जवानों के मारे जाने के बाद से भारत चीन सीमाओं पर तनाव है. दोनों ही देश सीमाओं पर अपनी ताकत मज़बूत करने में जुटे हैं इसलिए ऐसे में अरुणाचल बॉर्डर तक पहुंच रही चीन की रेलवे लाइन भारत की चिंता बढ़ाने का कारण बनती है.





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