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कश्मीर कथा -5: कनिष्क की चौथी बौद्ध महासंगीति और मौत का सौदागर मिहिरकुल


कनिष्क के बाद कुछ समय तक कश्मीर बौद्ध धर्म का बोलबाला रहा, लेकिन जैसे बाकी जगहों पर बौद्ध धर्म कमजोर होता चला गया वैसे ही कश्मीर में. यहां खास बात है कि बौद्ध धर्म का पतन भले ही हो गया हो, लेकिन कश्मीरी जनमानस पर बुद्ध की शिक्षाओं का असर तक दिखाई देता रहा है. कश्मीर में विकसित हुआ शैव हो या सूफी इसलाम, दोनो ही इससे अछूते नहीं हैं.

Source: News18Hindi
Last updated on: September 18, 2020, 2:24 PM IST

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कनिष्क का समय कश्मीर में शांति-समृद्धि व ज्ञान का समय रहा. कनिष्क ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. बौद्ध धर्म को राजधर्म का दर्जा मिला और उसके प्रचार-प्रसार का सबसे ज्यादा काम भी इसी दौरान हुआ. प्रसिद्ध बोधिसत्व नागार्जुन के जरिये श्रीलंका, चीन, बर्मा और इंडोनेशिया में कनिष्क बौद्ध धर्म का विस्तार किया. इसी काल में सर्वस्तिवाद के विचारों और उनसे संबंधित पुस्तकों को एकत्र कर कुंडलवन विहार में चौथी बौद्ध महासंगीति का आयोजन किया गया. इसका मुख्य उद्देश्य सर्वस्तिवाद को व्यापक आधार मुहैया कराना था.

इस महासंगीति की अध्यक्षता जाने-माने बौद्ध विद्वान वसुमित्र ने की. इसमें तीन बड़े ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गये. इनमें से एक महाविभासशास्त्र चीनी भाषा में आज भी उपलब्ध है. कनिष्क ने ही बौद्ध साहित्य के लिए प्राकृत की जगह संस्कृत का प्रयोग शुरू कराया था. चीनी यात्री ह्वेन सांग के मुताबिक कनिष्क के समय कश्मीर में 500 बौद्ध विद्वान रहते थे, जिसमें वसुमित्र भी शामिल थे. कनिष्क के बाद कुछ समय तक कश्मीर बौद्ध धर्म का बोलबाला रहा, लेकिन जैसे बाकी जगहों पर बौद्ध धर्म कमजोर होता चला गया वैसे ही कश्मीर में. यहां खास बात है कि बौद्ध धर्म का पतन भले ही हो गया हो, लेकिन कश्मीरी जनमानस पर बुद्ध की शिक्षाओं का असर तक दिखाई देता रहा है. कश्मीर में विकसित हुआ शैव हो या सूफी इसलाम, दोनो ही इससे अछूते नहीं हैं.

कश्मीरनामा के लेखक अशोक कुमार पांडेय लिखते हैं – कश्मीर में आठवीं-नौवीं शताब्दी में अपने तरह का शैव दर्शन विकसित हुआ. यह दर्शन विभिन्न अद्वैत और तांत्रिक धार्मिक परम्पराओं का एक समुच्चय है. वसुगुप्त की सूक्तियों का संकलन ‘स्पन्दकारिका’ इसका पहला प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है. वसुगुप्त के बाद उनके दो शिष्यों, कल्लट तथा सोमानंद ने इस दर्शन को मज़बूत वैचारिक आधार दिया. अभिनव गुप्त की पुस्तक ‘तन्त्रलोक’ एकेश्वरवादी दर्शन की इनसाइक्लोपीडिया मानी जाती है. उनके शिष्य क्षेमेन्द्र ने अपने गुरु का काम आगे बढ़ाते हुए अपनी पुस्तक “प्रत्याभिज्ञान हृदय’ में अद्वैत शैव परम्परा के ग्रंथों का सहज विश्लेषण प्रस्तुत किया. इस दर्शन ने कश्मीर जनजीवन पर ही नहीं अपितु पूरे दक्षिण एशिया की शैव परम्परा पर गहरा प्रभाव डाला. नौवीं से बारहवीं सदी के बीच बौद्ध धर्म का प्रभाव क्षीण होता गया और शैव दर्शन कश्मीर का सबसे प्रभावी दर्शन बन गया.

शैव राजाओं में मिहिरकुल का नाम प्रमुख है. वह था तो हूण लेकिन उसने शैव धर्म अपना लिया था. दरअसल ईसा की छठी सदी में जब गुप्त साम्राज्य का कमजोर होता जा रहा था, हूण जनरल मिहिरकुल ने उत्तर का कुछ हिस्सा कब्जा कर लिया, लेकिन कुछ दिनों में उसके खिलाफ सभी छोटे-बड़े राजा एक हो गये और उसे भागने पर मजबूर कर दिया. मिहिरकुल की गिनती क्रूरतम राजाओं में की जाती है. उसके शासनकाल मौतों का आनंद लिया जाता था. कल्हण राजतरंगिणी में लिखते हैं – चाहें दिन हो या रात, स्त्री हो या पुरुष, बच्चे हों या बुजुर्ग किसी पर कोई दयाभाव नहीं दिखाया जाता था. वह अपनी सेना के साथ जहां जाता, वहां कौए और गिद्ध एकत्र हो जाते थे. एक बार उसने अपनी रानी के वक्ष पर स्वर्ण चिन्ह उकरा हुआ देखा तो बहुत ही क्रोधित हुआ.

महल के जनानाखाने के रखऱखाव के इंचार्ज से जवाब तलब किया. इंचार्ज ने कहा कि रानी श्रीलंका के कपड़े की कसी हुई कंचुकी पहनती हैं. वहां के कपड़े पर सिंहली राजा के पदचिन्ह स्वर्ण में छपे होते हैं. इसके बाद वह दक्षिण की ओर गया और श्रीलंका पर आक्रमण कर जीत लिया. वहां के राजा को मौत के घाट उतारने के बाद ही उसका गुस्सा शांत हुआ. जब वह वहां से लौटकर कश्मीर घाटी में प्रवेश कर रहा था तो उसकी सेना का एक हाथी पहाड़ से नीचे गिर गया. वह चिंघाड़ रहा था.

मिहिरकुल को उसकी चिंघाड़ में बड़ा आनंद आया और उसने अपने साथ चल रहे सभी हाथियों को एक-एक कर नीचे ढकेलवा दिया और उनकी चिंघाड़ में आनंद लेता रहा। उसकी क्रूरता के तमाम किस्से मिलते हैं. एक बार वह नदी नहाने जा रहा था तो रास्ते में एक बड़ा पत्थर मिला. उस पत्थर को कोई नहीं हटा पाया. उस रात मिहिरकुल ने सपने देववाणी सुनी कि उस पत्थर में यक्ष का वास है. उस पत्थर सिर्फ एक पवित्र स्त्री ही हिला सकती है. सुबह उसने आदेश दिया कि राज्य की स्त्रियों को एक-एक पत्थर हिलाने के लिए भेजा जाए. बहुत सी स्त्रियों के विफल रहने के बाद एक कुम्हार की पत्नी चंद्रवती ने पत्थर को हिला दिया.

मिहिरकुल क्रोधित हो गया कि इतनी बड़ी संख्या में अपवित्र स्त्रियां उसके राज्य में हैं. उसने उन सभी स्त्रियों को उनके पति, भाई व बच्चों समेत मौत के घाट उतरवा दिया. राजतरंगिणी में लिखा है कि इस तरह उसने तीन करोड़ स्त्री-पुरुषों व बच्चों का कत्ल करवाया. सत्तर साल तक उसका शासन चला. उसकी मौत के बाद उसका पुत्र वक कश्मीर का राजा बना. इस वंश का सबसे यशस्वी राजा हुआ गोपादित्य. गोपादित्य का समय कश्मीर का सतयुग माना जाता है.इसके बाद द्वितीय गोनंद और कारकोटा नाग वंश का शासन रहा. कारकोटा नागवंश के राजा ललितादित्य मुक्तपीड को कश्मीर का महानतम राजा माना जाता है. ललितादित्य मुक्तपीड की कथा अगली कड़ी में.


ब्लॉगर के बारे में

राजेन्द्र तिवारीवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. अपने लंबे करियर के दौरान इन्होंने देश के प्रतिष्ठित अखबारों में अपनी सेवाएं दी हैं.

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First published: September 18, 2020, 2:24 PM IST





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