Home India News बिहार की स्टार्टअप दुनिया: जड़ों को लौटे, लेकिन तिनकों की तलाश

बिहार की स्टार्टअप दुनिया: जड़ों को लौटे, लेकिन तिनकों की तलाश


मारिया शकील /रौनक गुंजन

बिहार (Bihar) इन दिनों विधानसभा चुनाव (Assembly Election) को लेकर खूब सुर्खियां बटोर रहा है. इस बीच बिहार की राजनीति के मुख्य राजनीतिक दल ‘जनता दल’ (यूनाइटेड) और ‘राष्ट्रीय जनता दल’ ने चुनाव के लिए कमर कस ली है. इधर, कोरोनावायरस (Coronavirus) की वजह से देशभर लगे लंबे लॉकडाउन के कारण राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश पर भी बुरा असर पड़ा है. इस दौरान लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को काम छोड़कर अपने घर बिहार वापस आना पड़ा जिनसे उनकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई है. वहीं, सूबे की राजनीति में इन मजूदरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है. राज्य में सरकारी नौकरियों को लेकर भी आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं.

यहां बात शुरू करेंगे बिहार के सुपौल जिले के डॉक्टर परिवार से ताल्लुकात रखने वाले कंप्यूटर इंजीनियर मिथेश मलिक की कहानी से. मिथेश ने बताया, ‘आज से दो साल पहले की बात है जब वह बिहार में सरकारी अधिकारियों से कोई उम्मीद नहीं करते थे. मैं बिहार के लचर सरकारी सिस्टम में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहता था. हमारी कंपनी गुजरात, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में अपनी सेवाएं दे रही हैं. हम यहां के जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, क्योंकि यहां सरकारी कामों में तेजी नजर आती है, लेकिन बिहार में जमीनी स्तर पर कोई काम होता नहीं दिखता है.’

बता दें कि मिथेश उन 90 स्टारअप्स शुरु करने वालों में से एक हैं जिन्हें राज्य सरकार से 10 लाख रुपये अनुदान के रूप में मिले थे. उन्हें यह राशि मधेपुरा, वैशाली और कैमूर जिलों में टेली-मेडिसिन केंद्र को स्थापित करने के लिए मिली थी. साल 2007 में मदुरई कामराज विश्वविद्यालय से कंप्यूटर एप्लिकेशन में पीजी (Postgraduataion) करने के बाद वह बैंगलोर में ही नौकरी करने लगे थे, लेकिन उनके कुछ कर गुजरने के जज्बे ने साल 2014 में ‘बिहार फाउंडेशन बैंगलौर चेप्टर’ शुरू करने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने इसका सपना साल 2012 में ही बुन लिया था.

बीते महीने अगस्त में अपने दोस्तों के साथ मिलकर मिथेश ने एक हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म ‘प्रोसपर्टिया मेडी 360’ (Prosperita Medi 360) की शुरुआत की है. साल 2016 में सिर्फ एक बार ही इस प्लेटफॉर्म को फंड मिला था. इसके बाद राज्य सरकार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिला. मिथेश ने हाजिपुर के महनार में टेली-मेडिसिन केंद्र की शुरुआत के बारे में बताया “हमें प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर के लिए जगह जरूरत थी, हमे डॉक्टर्स के नेटवर्क की जरूरत थी, क्योंकि हमे जागरुकता अभियान भी चलाने थे, इस दौरान कड़ी मेहनत के बाद भी बीएसएनएल, बीबीएनएल और एयरटेल के इंटरनेट कनेक्शन भी नहीं पहुंचाया गया। इसके लिए कार्यक्रम के मोनिटरिंग वर्कर ने इंटरनेट कंपनियों को छह बार शिकायत पत्र भेजा था लेकिन इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया.”

इसके बाद मिथेश ने फैसला लिया कि वह पटना में इसके लिए एक सेंटर खोलेंगे. वहीं, साल 2018 में पटना के बिसकॉमन टॉवर (Biscomaun towers) में एक रिसर्च एंड डेवलेपमेंट ग्रुप बनाया, लेकिन इसका भी उन्हें कोई फायदा नहीं मिला. इस पर मिथेश ने कहा “बहुत दुख होता है जब अपने ही घर में काम नहीं कर पाते हैं लेकिन हम गुजरात, छत्तीसगढ़, बैंगलोर और केरल में इस काम को बखूबी कर रहे हैं. बता दें कि मिथेश आज देश में टेली-मेडिसिन के 27 केंद्र चला रहे हैं. वहीं, नाइजीरिया और पापुआ न्यू गुआना में भी एक-एक केंद्र हैं.”

स्टार्टअप शुरू करने वाले नौजवानों में से एक कौशलेंद्र कुमार ने बताया “मुझे बिहार में लौटे आज 13 साल हो चुके हैं और मैं देखता हूं कि बिहार में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं, आज मेरा ऑफिस बिहार के पूर्णिया और मोतिहारी में हैं और मुझे जेनरेटर के बारे में सोचना नहीं पड़ता. क्योंकि यहां अब दिन में 20 से 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है, जो कि उद्यमी और इनोवेटर्स के कार्यक्षेत्र के नजरिए से बहुत जरूरी है. इसके अलावा बिहार में सड़कों की स्थिति भी सुधरी है और साथ ही कुछ महिला समूहों का भी निर्माण हुआ है.”

कौशलेंद्र को ज्यादातर बिहारी लोग आईआईएम अहमदाबाद के सब्जीवाला के नाम से जानते हैं. क्योंकि वह बिहार लौटने वाले पहले उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने राज्य में अपना स्टार्टअप किया. कौशलेंद्र यह जानते हुए भी बिहार आए कि उनकों यहां महत्वपूर्ण संसाधनों से जुड़ी कई तरह की चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. वह इस बात से भी अच्छी तरह परिचित थे कि उन्होंने बैंगलौर, अहमदाबाद और दिल्ली में बेहतर काम किया है और वह इससे भी ज्यादा कर सकते थे. लेकिन, दिमाग में बिहार की छवि बनाकर वह होमटाउन लौटे. उन्हें लगता था कि वह अपने गांव महमदपुर से पटना के बीच 60 किमी के दायरे को एक घंटे में तय कर काम कर सकेंगे. लेकिन, साल 2003-2004 में यह संभव नहीं था. क्योंकि उस वक्त उन्हें अपने गांव महमदपुर से पटना जाने में तकरीबन चार घंटे का समय लगता था.

कुमार ने आगे बताया कि उन्होंने इस चुनौती को भी स्वीकार किया. कुमार का कहना है कि राज्य के सभी राजनीतिक दल शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दिखाएं, अपने चुनावी घोषणापत्र में हर क्षेत्र में कॉलेज खोलने की बात करें, बिहार के हर जिले में बीसीए, बीकॉम और इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने की सोचें.’
‘कोड बकेट’ के संस्थापक दिव्यम शर्मा कहते हैं “हालांकि राज्य में जमीनी स्तर पर कई बदलाव देखने को मिले हैं लेकिन यहां अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

दिव्यम को जब यह महसूस हुआ कि बिहार में भी कंपनी को स्थापित किया जा सकता है तो वह साल 2019 में यहां आ गए. जब वह बिहार पहुंचे तो उन्हें यहां कोई उम्मीद नजर नहीं आई. उन्होंने देखा कि यहां अच्छी आधारिक संरचना की कमी है. दिव्यम ने कहा कि अगर राज्य में रोजगारों के अवसर पैदा करने पर काम किया जाता तो बिहारियों को कमाने के लिए बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती.” दिव्यम ने आगे कहा कि अगर यहां ऐसा कुछ भी किया जाता तो हर कोई अपने संसाधनों और अपनी कुशलता को साझा कर सकता, लेकिन बिहार में स्टार्टअप के लिए सुविधानजक माहौल की बहुत बड़ी कमी है.

बता दें कि दिव्यम शर्मा ने साल 2017 में केरल के कोच्चि में अपने तीन साथियों के साथ ‘कोड बकेट’ की शुरुआत की थी और वह यह सोचकर बिहार वापस लौट थे कि वह राज्य में अपनी कंपनी का विस्तार करेंगे. लेकिन, दिव्यम को शुरुआत से ही यहां बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. दिव्यम ने कहा कि बिहार में सरकार की फंडिंग प्रक्रिया बहुत धीमी है जो राज्य के विकास में सबसे बड़ी बाधा है. यहां कोई भी स्टार्टप करने के लिए उद्योग विभाग पर निर्भर होना पड़ता है, लेकिन जब कभी हम यहां जाते हैं तो आपको नहीं पता होगा कि आपको स्टार्टप के लिए यहां किससे बात करनी होगी. क्योंकि बिहार सरकार और उद्योग विभाग ने स्टार्टप के लिए कोई पूछताछ केंद्र तक नहीं बनाया हुआ है.

शर्मा कहते हैं “अगर आपके साथ धोखा होता है और आपकी कम्पनी बड़ी नहीं है, तो केस दर्ज कर आप सालों तक नहीं लड़ सकते. स्टार्टअप इस तरह की मार नहीं झेल पाएंगे. अगर आप लोकल पुलिस स्टेशन में जाकर शिकायत दर्ज करते हैं, तो वे भी आपको गंभीरता से नहीं लेंगे. वे कहेंगे कि स्टार्टअप में इस तरह की चीजें होती रहती हैं. ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सरकार से नागरिक को समर्थन मिले.”
वह महसूस करते हैं कि बिहार में आईटी हब की कमी है. एक आशावादी युवा स्टार्टअप फाउंडर कहता है “जब उसी जगह बड़ी कम्पनियां स्टार्टअप्स के साथ काम करती हैं, तो व्यापार के विचारों को समर्थन और मार्गदर्शन मिलता है. इन तकनीकी कम्पनियों से सीखने को मिलता है. प्रतिकूलता के बावजूद हम अपना श्रेष्ठ दे रहे हैं” बिहार उद्यमी संघ के डाटा के अनुसार कोविड 19 के कारण वित्तीय चुनौतियाँ आने और ऑपरेशनल चीजों में विराम लगने से राज्य में 30 फीसदी स्टार्टअप निष्क्रिय हो गए हैं.

हालांकि बिहार में स्टार्टअप के उत्कर्ष या कमी को पूरी तरह से बिहार सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. कौशलेन्द्र और शशांक के साथ बिहार उद्यमी संघ की शुरुआत करने वाले अभिषेक कुमार कहते हैं “बिहार को प्रतिस्पर्धा करते हुए शीर्ष 4 या 5 राज्यों में होना चाहिए, यह जूनून गायब है. इस मानसिकता की अनुपस्थिति को बदलने की जरूरत है. उद्यम विभाग को स्मार्ट और गतिशील अधिकारियों की जरूरत है, जो राज्य के अंदर और बाहर बिहार ब्रांड की मार्केटिंग कर सके”.

एक स्टार्टअप छोटे ग्रुप में शुरू हुआ जो बढ़कर 19 हजार सदस्यों का हो गया. इस समूह ने बिहार की स्टार्टअप नीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाई. इस एसोसिएशन के सेक्रेटरी पटना में 150 स्क्वेयर फीट के ऑफिस से 36 हजार फीट के ऑफिस तक के सफर को याद करते हैं. वह कहते हैं “आप आईआईएम अहमदाबाद, आईआईएम रुड़की और आईआईएम एम इंदौर के स्टूडेंट्स को पटना में स्टार्टअप चलाते हुए देख सकते हैं. वह स्वास्थ्य सेक्टर से, कृषि और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं. कोविड 19 से पहले कई अमेरिका से भी लौटे हैं.

2015 में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने स्टार्टअप फंडिंग के लिए 500 करोड़ रूपये के कोष की स्थापना की. पिछले पांच सालों में 90 स्टार्टअप को फंड मिला है. 15 हजार आवेदन मिले थे. इसका उद्देश्य एक ऊष्मायन केंद्र स्थापित करना था. यह विचार युवाओं को उद्यमिता के माध्यम से सशक्त बना रहा था. “स्टार्टअप बिहार वेबसाइट पर आने वाले आवेदनों की स्क्रीनिंग के लिए अधिकारियों को नियमित मीटिंग्स करने की जरूरत थी. यह पूरी तरह से इण्डस्ट्री विभाग के अधिकारियों पर निर्भर था. पिछले डेढ़ साल में 4 से 5 इण्डस्ट्री कमिश्नरों के तबादले हुए. अगर आवेदन की स्क्रूटनी नहीं होगी तो वह अगले चरण और उसके बाद फाइनल चरण में नहीं जाएगा, जहाँ से ग्रांट के लिए मंजूरी मिलती है.”

अभिषेक कुमार का कहना है कि उनके ग्रुप को 2017 कके बाद किसी प्रारम्भिक जांच समिति की बैठकों में नहीं बुलाया गया क्योंकि हमने उनकी चिंताओं को कुछ कम कर दिया था. बिहार उद्यमी संघ के तीसरे संस्थापक शशांक कुमार बिहार में कृषि सेक्टर में काफी ज्यादा संभावनाएं देखते हैं. आईआईटी दिल्ली से 2008 में ग्रेजुएशन के बाद कुमार ने बिहार के छपरा लौटने से पहले गुरुग्राम में तीन साल तक काम किया.

उनका कहना है “मैंने नेस्ले (Nestle), पेप्सिको (Pepsico), ब्रिटानिया (Britania), यूनीलिवर और अन्य कम्पनियों में काम किया. इन कम्पनियों के कृषि के साथ नजदीकी सम्बन्ध हैं क्योंकि कृषि से सम्बन्धित खरीदारी इनमें काफी होती है. मैंने पाया कि सप्लाई चेन में काफी समस्याएँ हैं. यह पारदर्शी नहीं है. मैं ग्रामीण परिवेश से आता हूं और फ़ूड चेन के दोनों पक्ष देखे हैं. मैंने मेरे गाँव में यह भी देखा कि किसान ख़ास खुश नहीं हैं. जिन लोगों के पास करने को कुछ नहीं था, उन्होंने खेती चुन ली.”

कुमार जब 26 साल के थे उन्होंने 400 अरब रूपये के कृषि बाजार का पता लगाने का फैसला लिया था. शुरुआत बिहार से करनी थी. उन्होंने अपने गृह राज्य में वापस आने के तीन कारण बताए और कहा “2011 की बात है जब भारत में स्टार्टअप शुरू ही हुए थे. बिहार एक ऐसा राज्य है जो खेती पर निर्भर है और सिंचाई की कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि यह गंगा के क्षेत्र का हिस्सा है. किसान एक वर्ष में 3 से 4 फसलें उगाते हैं. इसलिए साल भर काम होता है.”

मनीष कुमार के साथ मिलकर शशांक ने 2012 में देहात (DeHaat) नामक एग्रीटेक स्टार्टअप की स्थापना की. इसमें किसानों को उच्च गुणवत्ता के कृषि इनपुट, अनुकूलित कृषि सलाहकार, वित्तीय सेवाओं तक पहुँच, पैदावार बेचने के लिए बाजार का लिंक आदि प्रदान किया जाता है. पिछले एक साल में इस स्टार्टअप ने 100 से ज्यादा कोर जुटाए हैं.

आशुतोष की स्टार्टअप यात्रा 2017 में बेंगलुरु में किराये का निवास स्थान खाली करने के बाद शुरू हुई. वह कहते हैं “कर्नाटक सरकार ने स्टार्टअप सेल शुरू किया जिसमें हमने भी आवेदन किया. हमने एक छोटा सा ऑफिस अपने किराये के फ़्लैट में सेट किया. कॉलेज खत्म होने के बाद हमारे मकान मालिक ने फ़्लैट खाली करने के लिए कहा. हमें अपना सामान ट्रांसपोर्ट करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इसके बाद दिमाग में यह विचार आया कि क्यों न इस क्षेत्र को स्टार्टअप मालिक के रूप में देखा जाए.”

अपने एक साथी सनी कुमार के साथ उन्होंने रोड एक्सप्रेस (Road Express) की स्थापना की. यह स्टार्टअप डिमांड पर छोटे वाहन और ट्रक सर्विस उपलब्ध कराता है. व्यक्तिगत और व्यावसायिक सामान ले जाने के लिए यह स्टार्टअप वाहन प्रदान करता है. आशुतोष एक घटना को याद करते हैं जब मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने खुद उन्हें स्टार्टअप आइडिया के लिए प्रोत्साहित किया. वह कहते हैं “पटना में एक एक्जीबिशन में मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने हमारे स्टॉल पर लम्बा समय बिताया. उन्होंने हमें इस आइडिया के लिए बधाई दी. उस साल हमने वह प्रतियोगिता भी जीती. तकनीकी रूप से मजबूत होने और एक मजबूत प्लान होने के बावजूद आशुतोष बिहार में बड़ी कम्पनियों के साथ मीटिंग्स करते हैं. वहां ट्रैकिंग या जवाबदेही के लिए कोई तन्त्र नहीं होते. हालांकि राज्य में कमियों को पहचानते हुए उन्होंने नए उद्यमियों के लिए एक उम्मीद की तस्वीर पेश की. उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अनुसार उभरते उद्यमियों के लिए स्टार्टअप इकोसिस्टम को विकसित करने में बिहार अग्रणी रहा है.

उन्होंने कहा “फंडिंग कभी समस्या नहीं थी. मेरे लिए नीतियाँ भी वही थे. सरकार ने फंडिंग के लिए करोड़ों रूपये उपलब्ध नहीं कराए. ये सिर्फ समर्थक हो सकते हैं. हमें काम में खुद ही अपनी टांग फंसानी होती है. बिहार में समस्या यही है कि लोग करोड़ों रूपये अकाउंट में चाहते हैं. इसके बाद ही वे काम करेंगे. चीजों के लिए यह आदर्श रास्ता नहीं है. हमें सबसे पहले काम शुरु करने की जरूरत होती है. मैं बिहार को अगली सिलिकन वैली बनाने का सपना देखता हूं.”

आशावादियों के ये समूह आशाहीनता को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं और एक-दूसरे की कहानियों में सहजता चाहते हैं. उम्मीद है कि उनका आदर्शवाद और राज्य के लिए प्यार बिहार को बढ़ावा देगा.





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