Home World News विदेशी जानकार कैसे पढ़ते हैं चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग का कुटिल दिमाग?

विदेशी जानकार कैसे पढ़ते हैं चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग का कुटिल दिमाग?


पीछे की तरफ देखने से ज़िंदगी को केवल समझा जा सकता है, लेकिन जीने के लिए आगे देखना ही पड़ता है. – सॉरेन किर्केगार्द (प्रसिद्ध डैनिश कवि)

चीन के President और कम्युनिस्ट नेता Xi Jinping के बुद्धि कौशल और सोच को लेकर इन दिनों काफी चर्चा है. अस्ल में, जबसे अमेरिका ने Coronavirus को चीन की देन बताने का नैरेटिव चलाया, तबसे China के खिलाफ विश्वव्यापी माहौल बना. माना जा रहा है कि Donald Trump का साथ देने की वजह से India पर दबाव बनाने के लिए चीन Border Tension का माहौल बना रहा है. ऐसे में, दूसरे देश जिनपिंग के दिमाग का विश्लेषण किस तरह कर रहे हैं, यह जानना वाकई समझ बढ़ाता है.

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अतीत को थामे, भविष्य की तरफरूस जाकर दोस्तोएव्स्की और गोगोल की बातें करना, तो फ्रांस में मॉलियर का उल्लेख भाषण में करना या हवाना पहुंचकर उस बार में जाना, जो लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे का पसंदीदा था… केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री रखने वाले जिनपिंग को खुद को साहित्यकार के तौर पर पेश करना भाता है. वह ऐसी ऐतिहासिक जगहों से खास लगाव रखते हैं, जो चीनी गाथाओं, इतिहास या स्मृतियों से जुड़ी हों. चीन के इतिहास को लेकर उनकी सोच पूरी तरह राष्ट्रवादी है.

दूसरी तरफ, जिनपिंग खुद को एक भविष्यदृष्टा नेता के तौर पर भी प्रस्तुत करते हैं. विज्ञान की प्रयोगशालाओं के दौरे करना, विज्ञान की बारीकियों पर चर्चा कर उसे अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के साथ जोड़ना जिनपिंग नहीं भूलते. यह जिनपिंग की खूबी है या चालबाज़ी? आगे के विश्लेषण के ज़रिये और परतें खुलती हैं.

‘जैसा देस, वैसा भेस’ में महारत
राजनीतिक चातुर्य में एक गुण है कि अपने विचार और भाषा की जगह आप उस भाषा और विचार को तरजीह दें, जिससे कुछ लाभ संभव है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता जिनपिंग जब आर्थिक मामलों के जानकारों या कारोबारियों के बीच बात करते हैं, तो उनकी भाषा में दुनिया के बिज़नेस क्लास के मुहावरे होते हैं, जबकि देखा गया है कि सैनिकों के साथ बात करते हुए उनकी ज़ुबान पर देशभक्ति के नारे, मा​र्क्सवादी थ्योरी के वाक्य और अपने ऐतिहासिक गौरव से जुड़ी कहावतें होती हैं.

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चीन के राष्ट्रपति और कम्युनिस्ट नेता शी जिनपिंग. फाइल फोटो.

असलियत में कैसा है जिनपिंग का दिमाग?
यह तो व्यक्तित्व की बात हुई, लेकिन इसके पीछे असल में जिनपिंग व्यक्ति के तौर पर क्या हैं? इस सवाल का जवाब फ्रैंकॉइस बूगॉन की 2018 में प्रकाशित किताब ‘इनसाइड द माइंड ऑफ जिनपिंग’ बहुत विस्तार से देती है. कम शब्दों में इस किताब का सार यह है कि दुनिया के अन्य बड़े और धूर्त नेताओं की तरह ही जिनपिंग भी प्रोपेगैंडा पसंद करने वाले ही नेता हैं.

साथ ही बूगॉन ये भी कहते हैं कि जिनपिंग अमीर और गरीब, हर वर्ग के साथ उसी शिद्दत के साथ मिलनसार हैं, चीन की ऐतिहासिक विरासत को सहेजते हैं, चीन के पारंपरिक विचार और महत्वाकांक्षाओं को बल देते हैं और पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओं के शब्द याद रखते हैं कि ‘इतिहास गवाह है कि अवसर बेहद कीमती होते हैं लेकिन कुछ ही देर के मेहमान होते हैं.’ कोई भी अवसर गंवाना जिनपिंग के दिमाग को शोभा नहीं देता.

परंपरा के साथ ही ग्लोबल लीडरशिप
चीन की विदेश नीति के रूप में डेंग शियाओपिंग का यह संदेश गूंजता रहा कि ‘सही वक्त आने तक अपनी ऊर्जा को छुपाकर रखो’. लेकिन जिनपिंग ने इस मुहावरे को बदलते हुए कहा कि ‘हर मुमकिन ज़ोर लगाकर हासिल करो.’ इसी का नतीजा है कि चीन अपनी विदेश नीति के तहत पड़ोसियों की सीमाओं पर दावे के साथ ही मित्र देशों की संप्रभुता और हर जगह लोगों की आज़ादी पर खतरा पैदा कर रहा है.

पूरी दुनिया यह समझने की ज़रूरत महसूस कर रही है कि पहले के चीन से जिनपिंग का चीन किस तरह अलग हो गया है. चीन के इतिहास, भूगोल और समाज की गहरी समझ रखने वाले जिनपिंग अपनी पार्टी में अक्सर कहते हैं कि चीन की पारंपरिक संस्कृति और मार्क्सिज़्म पर एक साथ गर्व करना मुमकिन है. कुल मिलाकर जिनपिंग का चीन दुनिया में अपना वर्चस्व तलाशने की राह पर है और वह अमेरिका को पछाड़कर विश्व की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा रख रहा है. इसके सबूत भी साफ दिख रहे हैं.

जिनपिंग का चीन क्यों लग रहा है खतरा?
1. ताज़ा खबरों की मानें तो 30 देशों के रणनीतिक संगठन NATO के महासचिव जेंस स्टॉल्टेनबर्ग ने चीन को दुनिया के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बताया है. दुनिया भर में बड़े आर्थिक​ निवेश, आर्कटिक और अफ्रीका तक चीनी फौजों की मौजूदगी और रूस के साथ चीन की बढ़ती कदमताल नाटो को खतरा महसूस हो रही है.

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भारत के साथ सीमा पर तनाव बढ़ाने के साथ नेपाल को भारत के खिलाफ उकसाने के आरोप चीन पर लग चुके हैं. (File Photo)

2. मुख्यत: आर्थिक मुद्दों को लेकर विचार करने वाले संगठन जी7 ने भी हांगकांग की स्वायत्ता के लिए चीन के खतरा बन जाने को लेकर चिंता जताई है.

3. यूरोपियन यूनियन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रूस और चीन वैश्विक महामारी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर घोटालों, नफरतों और दुनिया के स्वास्थ्य के लिए खतरों को हवा दे रहे हैं.

4. करीब डेढ़ हफ्ते पहले ट्विटर ने फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में चीनी सरकार से जुड़े करीब 1 लाख 70 हज़ार अकाउंट्स को खत्म कर दिया.

संडे हेराल्ड की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिनपिंग ने सालों तक जो चाहा, वो किया है, अंतर्राष्ट्रीय कानून तोड़े हैं लेकिन कभी कोई कीमत नहीं चुकाई. हो सकता इस बार भी वर्चस्व की हवस में आक्रामक मुहिमों के लिए भी चीन को कोई कीमत न देना पड़े.

आखिर मनमानी क्यों करते हैं जिनपिंग?
CGTN की एक रिपोर्ट की मानें तो ज़िद, लगन, गुस्सैल स्वभाव और नेतृत्व की सख्त ट्रेनिंग उन्हें अपने पिता से मिली थी और उनकी सोच में एक हद तक यही प्रभाव झलकते हैं. दूसरी तरफ, बूगॉन की थ्योरी के हिसाब से फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट कहती है कि माओ की विचारधारा को फिर ज़िंदा करने और उसे पोसने की इच्छा जिनपिंग की सोच का अस्ल कारण है.

जिनपिंग को माओ के दौर और सोच से इमोशनल लगाव रहा है. ली फेंग, जियाओ यूलू और ग्यू वेनचांग जैसे जो लोग माओवाद को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करते थे, वो जिनपिंग के बचपन के हीरो रहे हैं. जिनपिंग इन लोगों के नाम अपने भाषणों में कई बार लेते रहे हैं. कई भाषणों में उन्होंने कहा है कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी को सांस्कृतिक विघटन की रणनीति के साथ अमेरिका और उसके साथियों ने खत्म किया. इसलिए जिनपिंग चीन में सांस्कृतिक प्रदूषण के खिलाफ रहे हैं.

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यानी दोधारी तलवार है जिनपिंग की सोच?
मार्क्सवाद, माओवाद और राष्ट्रवाद को एक साथ संभालने के लिए जिनपिंग की सोच का तराज़ू कितनी देर कारगर साबित होगा? लेकिन सच है कि जिनपिंग चीन में क्रांति के दौर के पुरुष हैं, जल्दी विचलित न होना, प्रभावित न होना और चीनी गांवों को समझने की कुशलता के साथ ही दुनिया के हर बाज़ार की समझ होना जिनपिंग के गुण हैं. दुनिया में कड़ी प्रतियोगिता के समय में जिनपिंग खुद को चीनी समाज की राष्ट्रवादी चेतना का केयरटेकर समझते हैं.

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दूसरी तरफ, जिनपिंग की महत्वाकांक्षाओं से एक तस्वीर चीन के खिलाफ ही बन रही है. तकनीक, विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष में प्रभुत्व और अर्थव्यवस्था में वैज्ञानिक नज़रियों के लिए चर्चित होते जा रहे चीन को न्यूटन का वह तीसरा नियम याद रखना होगा कि ‘हर क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है.’





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