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हांगकांग जितने बड़े इलाके में फैला है चीन का आर्मी बेस, सैनिक आपस में लड़ते हैं नकली जंग


चीन के सैनिकों (Chinese soldiers) के बारे में कहा जाता है कि उनकी ट्रेनिंग इतनी तगड़ी होती है जो मजबूत से मजबूत सेना को परेशान कर दे. ये कुछ रोज की ट्रेनिंग नहीं, बल्कि इसके पीछे सालों-साल की मेहनत होती है. चीन में पूरे एशिया का सबसे बड़ा आर्मी ट्रेनिंग कैंप है. इनर मंगोलिया (Inner Mongolia) में बने इस ट्रेनिंग बेस को जुरिहे कंबाइंड टैक्टिक्स ट्रेनिंग बेस (Zhurihe Combined Tactics Training Base) कहते हैं. यहां चीनी सैनिक रोज अलग-अलग समूहों में बंटकर जंग की प्रैक्टिस करते हैं. ये लड़ाई इतनी असल होती है कि इस दौरान कई सैनिक घायल भी हो जाते हैं. माना जा रहा है कि चीन 60 सालों से ये कर रहा है ताकि युद्ध के हालात बनने पर उनकी सेना भारी दिखे. जानिए, क्या है इस ट्रेनिंग बेस की खासियत.

उत्तरी चीन के सुदूर इलाके में बसे Zhurihe कैंप पीपल्स लिबरेशन आर्मी का सबसे एडवांस ट्रेनिंग बेस है. चीन के दूसरे मिलिट्री कैंपों की बजाए ये एक खास मकसद से बना है. इसके तहत सैनिकों को युद्ध जैसे हालात उपलब्ध कराए जाते हैं.

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ट्रेनिंग बेस लगभग 1,066 स्क्वैयर किलोमीटर इलाके में फैला हुआ है. ये जगह इतनी बड़ी है जिसमें पूरा हांगकांग समा जाए. इसमें आर्मी के लोगों को घर जैसा अनुभव देने के लिए अस्पताल, पार्क, थिएटर और दुकानें जैसी सुविधाएं भी हैं. और तो और, यहां पर दुश्मन देशों की तरह दिखने वाली कई इमारतें बनी हुई हैं ताकि लड़ाई एकदम असली लगे.

नकली लड़ाई के कई हिस्से चीन के सेंट्रल टेलीविजन पर आते रहते हैं

लेकिन इस इलाके की खासियत है यहां चलने वाली लड़ाई. यहां मैदानों में ही सैनिक नहीं लड़ते, बल्कि पहाड़ों और रेतीले इलाकों में भी लड़ाई की प्रैक्टिस चलती रहती है. अलग-अलग जगहों और अलग-अलग तरीकों से लड़ाई की प्रैक्टिस के पीछे चीन का साफ इरादा है कि दुनिया के मुश्किल से मुश्किल इलाके में भी सेना को लड़ने की आदत रहे.

नकली लड़ाई के कई हिस्से चीन के सेंट्रल टेलीविजन पर आते रहते हैं. इसी हिस्से में एक ऐसी बिल्डिंग बनी हुई है जो ताइवान के प्रेसिडेंट ऑफिस जैसी दिखती है. वहां पर भी सैनिकों की मॉक लड़ाई होती है. चीन के सामरिक मामलों के जानकारों का मानना है कि ताइवान जैसी इमारत के पास लड़ाई दिखाने के पीछे चीन का कुटिल दिमाग है, जो ताइवान को एक तरह से जंग की धमकी दे रहा है.

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लड़ाई की ट्रेनिंग के लिए सैनिकों को रेड और ब्लू टुकड़ियों में बांटा गया है. वैसे तो कई देशों में मॉक लड़ाई के लिए सैनिकों को अलग-अलग रंगों की यूनिफॉर्म दी जाती है. जैसे पश्चिमी देशों में दुश्मन सेना के लिए लाल रंग दिया जाता है. लेकिन चीन क्योंकि कम्युनिस्ट देश है इसलिए उसने अपने लिए लाल रंग चुना. वहीं सैनिकों की एक टुकड़ी जो दुश्मन देश के रोल में रहती है, उसे नीला रंग दिया जाता है.

सैनिक नकली न्यूक्लियर युद्ध और यहां तक कि जैविक हथियारों से लड़ाई की भी प्रैक्टिस करते हैं

वहां नकली लड़ाई को Stride कहा जाता है. वैसे चीन के सैनिकों के बीच चलने वाली इस नकली लड़ाई की एक सबसे खास बात है. इसके तहत उन सारे देशों की सैन्य रणनीति को स्टडी किया जाता है, जिन्हें चीन दुश्मन मानता है. इसमें पश्चिमी देशों के साथ भारत भी शामिल है. नीली यूनिफॉर्म पहनी सेना दुश्मन सेना की तरह एक्ट करती है और लाल सेना यानी चीनी सेना का काम होता है उसे हराना.

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खुद को मजबूत बनाने के लिए सैनिक नकली न्यूक्लियर युद्ध और यहां तक कि जैविक हथियारों से लड़ाई की भी प्रैक्टिस करते हैं. साथ में सारे हथियार होते हैं, जो लड़ाई के मैदान में होते हैं. ये लड़ाई इतनी असली होती है कि इस दौरान काफी सारे चीनी सैनिक घायल हो जाते हैं. यहां तक कि ये भी कहा जाता है कि इस दौरान सैनिक मारे भी गए हैं. हालांकि PLA ने कभी भी इस बारे में कोई लिखित या मौखिक स्टेटमेंट नहीं दिया.

चीन के इस ट्रेनिंग बेस की तुलना अमेरिका के Fort Irwin से की जाती है. साल 1979 में कैलीफोर्निया के मरूस्थल में बना ये बेस 2600 स्क्वैयर किलोमीटर में फैला है और वहां भी चीन की तरह ही लगातार सैनिकों की नकली लड़ाइयां चलती रहती हैं. यहां पर इराक के गांवों की तरह नकली स्ट्रक्चर, मस्जिदें और होटल बने हैं, जिनपर हमला और तोड़फोड़ चलती रहती है.





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