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OPINION: गरीबी उन्मूलन योजना के जनक रघुवंश प्रसाद को RJD की पारिवारिक चुनावी खेल ने कैसे हाशिए पर डाल दिया


रघुवंश प्रसाद सिंह ने इसी हफ्ते आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे दिया है (फाइल फोटो)

रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh Prasad Singh) मनमोहन सिंह सरकार में जितेंद्र कुमार की तरह थे. गांव के मंजे हुए पुराने नेताओं की कार्यशैली वाले सिंह ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को एक अलग तरह की गरिमा प्रदान की थी

नई दिल्ली. एक सांसद के रूप में रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh Prasad Singh) दिल्ली के अशोक रोड पर बीजेपी (BJP) राष्ट्रीय मुख्यालय के ठीक सामने रहते थे. यह वर्ष 2009 की बात है जब बीजेपी विपक्ष में थी, और अभी तक उसका कार्यालय दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थिति आधुनिक बहुमंजिली इमारत में नहीं था. रघुवंश बाबू मनमोहन सिंह सरकार (Manmohan Singh Government) में मंत्री थे और वो ग्रामीण विकास मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे. वो एक ऐसे मंत्री थे जो सुबह के भोजन (वो अमूमन दिन में एक ही बार खाते थे) के बाद टहलते हुए कृषि भवन (Krishi Bhavan) पहुंच जाते थे और फिर वहां दिन भर रहते थे. वो नौकरशाहों, पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से देर शाम तक मिलते-बैठते रहते.

अपनी बात वो बहुत शुद्ध हिंदी में रखते और मंत्रिमंडल की बैठक में लोगों के प्रश्नों का जवाब या अपनी दलील अंग्रेज़ी में एक विशेष अंदाज (Oxbridge English) में देते. रघुवंश प्रसाद मनमोहन सिंह सरकार में जितेंद्र कुमार की तरह थे. गांव के मंजे हुए पुराने नेताओं की कार्यशैली वाले सिंह ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को एक अलग तरह की गरिमा प्रदान की थी. उन्होंने ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम पेश किया. यह दुनिया का सबसे बड़ी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम था जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है. इसके लागू होने के 15 साल बाद और संसद के अंदर और बाहर कई बार लोगों की आलोचनाओं का निशाना बनने के बावजूद सभी सरकारें- केंद्र और राज्य, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से उबारने के लिए इस योजना पर निर्भर रही हैं, भले ही वो सूखा हो या महामारी.

लालू ने सोच-समझकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में रखने की पैरवी की थी

जाति से राजपूत, रघुवंश प्रसाद सिंह को यूपीए की वर्ष 2004 में अचंभित कर देने वाले जीत के बाद लालू यादव ने बहुत सोच समझकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में रखे जाने की पैरवी की थी. आरजेडी प्रमुख ने ओबीसी-मुस्लिम-दलित का एक बहुत अच्छा जातीय समीकरण तैयार किया था, और बाद में इसमें ऊंची जातियों के कुछ नेताओं को भी जगह दी थी ताकि एनडीए को वो मात दे सकें. रघुवंश प्रसाद (राजपूत) और अखिलेश सिंह (भूमिहार) जैसे अगड़ी जाति के नेता न केवल अपनी सीट जीतने में सफल रहे बल्कि उन्हें मंत्री भी बनाया गया जो बीजेपी के लिए एक बड़ा संकेत था.लालू को यूपीए-1 की सरकार में रेलवे जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय मिला और उन्होंने ऊंची जाति के अन्य नेताओं को मंत्रिमंडल में प्रमुख पदों पर नामित किया. पर 2009 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले लालू और रामविलास पासवान ने एक बहुत ही गलत फैसला लिया और बिहार के लिए अपने उम्मीदवारों की अलग-अलग घोषणा कर दी और कांग्रेस को मझधार में छोड़ दिया. इसकी वजह से वोटों का बंटवारा हुआ और एनडीए को इसका फायदा हुआ, और उसे बिहार में बड़ी जीत मिली. पर कांग्रेस को अन्य राज्यों में बढ़त मिली और ज्यादा संख्या पाकर सत्ता में वो दोबारा काबिज हुई.

कांग्रेस उन्हें मंत्री बनाना चाहती थी पर लालू यादव इसके खिलाफ अड़ गए 

रघुवंश बाबू उन चार सांसदों में शामिल थे जो 2009 में चुनाव जीतने में सफल रहे. कांग्रेस उन्हें मंत्री बनाना चाहती थी पर लालू यादव इसके खिलाफ अड़ गए. ‘राष्ट्रपति भवन में जो सूची भेजी गई उसमें ग्रामीण विकास मंत्रालय का स्थान खाली रखा गया था. अंतिम समय तक मनाने का प्रयास करने के बावजूद आरजेडी नहीं मानी,’ रघुवंश सिंह ने इस रिपोर्टर को पटना-मोतिहारी रोड पर 2019 के आम चुनाव में कांटी में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करने के मौके पर कहा था, ‘अगर मैं अपनी पार्टी की इच्छा के विरुद्ध मंत्रिपद लेता तो मैं अवसरवादी करार दिया जाता.’ उन्होंने कहा कि वो वीणा सिंह से चुनाव हार गए. वीणा सिंह स्थानीय बाहुबली दिनेश सिंह की पत्नी थी जो लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही थीं.

यह रघुवंश प्रसाद सिंह की लगातार दूसरी हार थी. इससे पहले 2014 में भी वो राम किशोर सिंह (रामा सिंह) से चुनाव हार गए थे और अब तेजस्वी यादव के उनको अपने साथ लाने के कारण रघुवंश सिंह ने पार्टी छोड़ दी है. शायद लालू जातियों और समुदायों का समीकरण बिठाने में बहुत निपुण थे और इस बल पर चुनाव जीत जाते थे. उनकी लगातार अनुपस्थिति और लंबे समय तक जेल में रहने से पार्टी को नुकसान हुआ है. लेकिन इसके बावजूद 2014 में जब लालू के पुराने साथी रामकृपाल यादव ने आरजेडी छोड़ी तब भी रघुवंश सिंह पार्टी में बने रहे. बिहार की राजनीति में जहां सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी को बहुत वजन दिया जाता है, इस पुराने समाजवादी के लिए किसी पार्टी से बुलावे की कोई कमी नहीं थी. वो उन कुछ लोगों में शामिल हैं जो लालू यादव से सीधे बात कर सकते थे और वो भी बिना किसी लाग लपेट के.

मोदी सरकार के कोटा कार्ड के खिलाफ आगाह किया था

2019 के आम चुनाव के समय उन्होंने आरजेडी को ऊंची जातियों में गरीब तबकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए मोदी सरकार के कोटा कार्ड के खिलाफ आगाह किया था. लेकिन कोर मुद्दों पर राजनीतिक निर्णयों से ज्यादा, लालू यादव के परिवार के बाहर मौजूद लोगों और समुदायों को पार्टी में जगह नहीं दे पाने के कारण बड़ी संख्या में उसके नेता उससे विमुख हो गए. इससे पार्टी का जनाधार घटने लगा. मंडल की पैदाइश पार्टियों को उत्तर प्रदेश और बिहार में बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं क्योंकि इन पार्टियों की स्थिति प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह हो गई है.

राष्ट्रीय जनता दल पिछले 10 वर्षों में रघुवंश प्रसाद सिंह को बहुत आसानी से राज्यसभा में भेज सकती थी. वो संसद की एक विश्वसनीय आवाज थे. पर जब भी मौका सामने आया, राज्यसभा सीट को लेकर लालू परिवार में ही उठापटक होने की नौबत आई.


First published: June 24, 2020, 7:37 PM IST





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