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किन देशों में गिरती है सबसे ज़्यादा बिजली और क्या होता है वॉर्निंग सिस्टम?


बीते हफ्ते बिजली गिरने से Bihar और पूर्वी Uttar Pradesh में 110 से ज़्यादा मौतें होने की खबरें आईं और ये भी कहा गया चूंकि काफी लोग झुलसे भी इसलिए मौतों का आंकड़ा बढ़ सकता है. बिजली गिरने से हर साल कई जानें जाती (Casualty) हैं, न सिर्फ India में बल्कि दुनिया में. जानिए कि दुनिया में बिजली गिरने (Lightning & Thunderstorm) की घटनाएं सबसे ज़्यादा कहां होती हैं, कितनी जानें जाती हैं और इससे बचाव के क्या तरीके (Warning System) अपनाए जाते हैं.

कितनी जानलेवा है बिजली?
दुनिया में हर साल बिजली गिरने की करीब 2 लाख 40 हज़ार घटनाएं दर्ज होती हैं. इन घटनाओं में कितनी जानें जाती हैं, इसे लेकर कई तरह के अध्ययन अलग आंकड़े बताते हैं. एक स्टडी की मानें तो दुनिया में 6 हज़ार लोग हर साल बिजली गिरने से मारे जाते हैं. वहीं, नेशनल जियोग्राफिक के मुताबिक 2000 जानें जाती हैं. अमेरिका के मौसम विभाग के पोर्टल के मुताबिक वहां हर साल औसतन 27 लोग मारे जाते हैं.

दूसरी तरफ, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की मानें तो सिर्फ भारत में ही हर साल 2000 लोग बिजली गिरने से मारे जाते हैं. भारत सरकार के मंत्रालय और मौसम विभाग के साथ CROPC के 2019 से 2021 के दौरान बिजली गिरने के संबंध में किए गए अध्ययन के मुताबिक 2019 में देश में बिजली गिरने से करीब 1300 मौतें दर्ज हुईं.कहां हैं दुनिया में ​बिजली के हॉटस्पॉट?

दुनिया में जिस जगह बिजली संबंधी सबसे ज़्यादा घटनाएं होती हैं, वह हॉटस्पॉट दक्षिण अमेरिका के वेनेज़ुएला में स्थित लेक मैराकाइबो है. इस हॉटस्पॉट पर बिजली चमकने की दर का घनत्व 232.52 है. इस दर का मतलब यह है कि हर साल हर वर्ग किलोमीटर के दायरे में 232.52 बार बिजली गड़गड़ाती है. अब जानिए दुनिया के वो हिस्से जहां बिजली चमकने और गिरने के वाकये सबसे ज़्यादा होते हैं.

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झीलों और जलाशयों आदि में बिजली गिरने की घटनाएं ज़्यादा होती हैं.

कोंगो : मध्य अफ्रीका के इस क्षेत्र में बिजली संबंधी एक्टिविटी की फ्रिक्वेंसी दुनिया में सबसे ज़्यादा है. कोंगो डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में कई इलाके ऐसी घटनाओं के लिए संवेदनशील हैं. अस्ल में, पृथ्वी पर बिजली संबंधी एक्टिविटी उन क्षेत्रों में ज़्यादा दर्ज होती है, जो इक्वेटर के आसपास स्थित हैं.

दक्षिण अमेरिका : यहां उत्तर पश्चिम इलाकों में प्रशांत महासागर की तरफ से गर्म और आर्द्र हवाएं चलती हैं जिससे बादल गरजने और बिजली कड़कने जैसी घटनाएं होती हैं.

हिमालयी क्षेत्र : यहां हिन्द महासागर की तरफ से हिमालय पर्वत श्रंखला तक गर्म और आर्द्र हवाओं के कारण भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के कई इलाकों में ये घटनाएं होती हैं.

सेंट्रल फ्लोरिडा : टैम्पा और ओरलैंडो के बीच के हिस्से को ‘बिजली वीथिका’ भी कहा जाता है. यहां ऐसा क्षेत्र मेक्सिको की खाड़ी और अटलांटिक महासागर की तरफ से आने वाली हवाओं के कारण बनता है.

अर्जेंटीना व कोलंबिया : अटलांटिक महासागर से चलने वाली मौसमी आर्द्र हवाओं की वजह से यहां प्रचंड बादल बिजली गरजने चमकने की घटनाएं होती हैं.

इंडोनेशिया व मलेशिया : हिंद महासागर से चलने वाली गर्म और आर्द्र हवाएं जब जावा और सुमात्रा के ज्वालामुखी वाले पहाड़ों तक पहुंचती हैं तो थंडरस्टॉर्म पैदा होते हैं.

भारत में बिजली संबंधी एक्टिविटी पर आधारित CROPC के अध्ययन में पाया गया कि 2019 में ओडिशा में सबसे ज़्यादा 9 लाख+ एक्टिविटी हुईं. देश में कुल एक्टिविटी का यह 15% है. इसके बाद महाराष्ट्र में 626469, कर्नाटक में 621867, पश्चिम बंगाल में 539608 और मध्य प्रदेश में 481720 एक्टिविटी दर्ज की गईं. उत्तर प्रदेश में 322886 और बिहार में 225508 एक्टिविटी दर्ज हुईं.

बिजली गिरने का भूगोल और भौतिकी
यों तो बिजली गिरने का मौसम सिर्फ बारिश नहीं है, फिर भी भारतीय उपमहाद्वीप में ज़्यादातर संभावनाएं अप्रैल से जुलाई के बीच होती हैं. आकाशीय बिजली को दो तरह से दर्ज किया जाता है. इंटर क्लाउड (IC) और बादल से ज़मीन पर गिरने वाली बिजली (CG). CG जानलेवा या बेहद नुकसानदायक होती है जबकि IC से जानोमाल का नुकसान नहीं होता. वहीं, CG बेहद खतरनाक होती है. आठ करोड़ मोमबत्तियां जैसे साथ में जल जाएं, इतनी रोशनी आंखें खराब कर सकती है और इतना ताप झुलसाने से लेकर राख भी कर सकता है.

बिजली गिरने संबंधी अलर्ट सिस्टम क्या और कैसा है?
यह दो तरह से काम करता है. एक तो सेंसर के ज़रिये ऐसे यंत्र बनाए जाते हैं जो बादलों की ग​तिविधियों को भांपकर बिजली चमकने या गिरने का पूर्वानुमान आंधे घंटे पहले दे देते हैं. और एडवांस सेंसर की मदद से तीन से चार घंटे पहले भी अनुमान मिल सकते हैं. दूसरा सिस्टम आधुनिक तकनीक के ज़रिये एप्स हैं. इन एप्स के ज़रिये पूर्वानुमान पाए जा सकते हैं, जो सैटेलाइट के डेटा के माध्यम से लगाए जाते हैं.

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​भारत में आकाशीय बिजली संबंधी सबसे ज़्यादा घटनाएं ओडिशा में दर्ज होती हैं.

भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने दामिनी एप की सुविधा दी है, ​जो पूर्वानुमान लगा सकता है. लेकिन देश में सूचना तंत्र ठीक न होने से ग्रामीण इलाकों तक सूचना पहुंचना बड़ा मुश्किल है. एनबीटी ने सोमवार संस्करण में प्र​काशित एक लेख में लिखा है कि अमेरिका जैसे देशों में संचार प्रणाली विकसित होने से वहां बिजली गिरने से मौतें कम होती हैं.

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बिहार की केस स्टडी बहुत कुछ समझाती है
प्राकृतिक आपदाओं की वजह से होने वाली मौतों के मामले में बिहार अव्वल है. यह दावा करते हुए द वायर की एक रिपोर्ट बिजली गिरने के वॉर्निंग सिस्टम के बारे में बताती है कि 2017 में जब 171 लोग मारे गए तब बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और मौसम विभाग ने कोशिशें कीं और बिजली गिरने संबंधी वॉर्निंग सिस्टम की मशीनें लगवाईं. विशेषज्ञों के मुताबिक पूरा राज्य इन मशीनों के दायरे में है और हर इलाके का अनुमान मिल सकता है.

इस पूरे सिस्टम के बावजूद बिहार में लोगों तक कोई चेतावनी, सूचना और हिदायत जारी नहीं की गई, जिससे वो बिजली गिरने को लेकर सतर्क हो सकें. बिहार के आपदा प्रबंधन का यह भी दावा है कि उसने 20 किमी के दायरे में बिजली गिरने की घटना को लेकर अनुमान देने वाला एक एप भी सबके लिए जारी किया है. इसके बावजूद रिपोर्ट की मानें तो एप हो या सेंसर से वॉर्निंग सिस्टम, आम लोगों की जानकारी और पहुंच में कोई सूचना नहीं है.





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