Home Health & Fitness कोरोना वैक्सीन पर टकराव और ड्रग कंपनियों के गंदे खेल!

कोरोना वैक्सीन पर टकराव और ड्रग कंपनियों के गंदे खेल!


दुनिया में Corona Virus संक्रमितों की संख्या एक करोड़ और पांच लाख से ज़्यादा मौतें होने के बीच वैक्सीन को लेकर दुनिया भर में घमासान है. Covid-19 को लेकर USA और पश्चिमी देशों ने चीन के खिलाफ जो नैरेटिव तैयार किया, उसी क्रम में इस सियासत को देखा जाना चाहिए. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक 100 से ज़्यादा संभावित वैक्सीन हैं लेकिन टॉप 7 या 8 वैक्सीनों पर एक सियासत ज़ोरों पर है.

चीन पर आरोप लगाए गए कि वो वैक्सीन के लिए पश्चिमी देशों में हो रही रिसर्च के डेटा में सेंधमारी कर रहा है. इन आरोपों का खंडन चीन में कई तरह से किया भी ​गया, लेकिन यह मुद्दा लगातार बना हुआ है. इस पूरे मामले के साथ ही, ये भी जानिए कि ड्रग कंपनियां किसी नई दवा या वैक्सीन को लेकर किस तरह के अनैतिक और झूठे खेल खेलने में माहिर रही हैं.

किस तरह लगाए जा रहे हैं चीन पर आरोप?
वैक्सीन को लेकर चल रही रिसर्च चुराने संबंधी आरोप चीन पर लगाए जाने का सिलसिला ज़ोरों पर है. बाते 6 मई को एक ब्रिटिश टैबलॉयड ने ‘हमारी वैक्सीन लैब में सेंध लगाने की चीन की हिम्मत कैसे हुई?’ शीर्षक से विस्तृत रिपोर्ट छापी थी. उसके बाद अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने एक चेतावनी जारी करते हुए कहा कि चीन वैक्सीन और कोविड 19 के इलाज के लिए चल रहे शोध चुराने के लिए सायबर अटैक कर सकता है.ये भी पढ़ें :- जानिए कितनी काबिल और खतरनाक है चीन की महिला फौज

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हालांकि एफबीआई ने इसे गंभीर चेतावनी करार दिया लेकिन सीएनएन ने इस बारे में रिपोर्ट छापते हुए दावा किया था कि इस तरह की चेतावनी देते हुए एफबीआई ने इस आरोप के पीछे कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया.

क्यों लगाए गए इस तरह के आरोप?

पहला कारण तो यही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के रवैये से सख्त नाराज़ हैं इसलिए वो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर चीन को हर तरफ से घेरने की फिराक में रहे हैं. दूसरी वजह है कि दुनिया में जो टॉप 8 वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल फेज़ में रहीं, उनमें से 4 चीन, 3 अमेरिका और 1 यूनाइटेड किंगडम की हैं.

इसके अलावा, चीन की वैक्सीन के लिए ट्रायल को लेकर ऑस्ट्रेलिया और कनाडा न केवल मंज़ूरी दी, बल्कि उत्साह भी जताया इसलिए रेस में शामिल दुनिया भर की कंपनियां अपनी वैक्सीन को बढ़त दिलाने के लिए अन्य वैक्सीनों के खिलाफ माहौल तैयार करने में लग गईं.

इन इल्ज़ामों पर चीन का जवाब
चीन के स्टेट मीडिया सीजीटीएन पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि यह चीन के खिलाफ षडयंत्र है​ कि वह रिसर्च चुराने की फिराक में है. इस रिपोर्ट में आरोपों को बकवास बताने के तर्क के रूप में सबसे पहले तो यही है चूंकि चीन वैक्सीन विकास में अग्रणी दिख रहा है, इसलिए उसे बेवजह घेरा जा रहा है. दूसरी तरफ, यह भी कहा गया कि चीन वैक्सीन विकास को पूरी मानवता के लिए देखता है, इसलिए ऐसे आरोप लापरवाही और हेकड़ी की ही मिसालें हैं.

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चीन और पश्चिमी देशों के बीच वैक्सीन को लेकर आरोपों प्रत्यारोपों का दौर जारी है.

चीन ने बताई प्रक्रिया और किए पलटवार
इस तरह के आरोपों को खारिज करने वाली सीजीटीएन की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चीन वैक्सीन को लेकर कठोर कानूनों का पालन करने वाला देश है. एक सख्त नियम तो दिसंबर 2019 में ही लागू हुआ था यानी कोविड 19 के फैलने से ऐन पहले ही. दूसरी तरफ, इसी महीने चीन ने अमेरिकी सीनेटर को चुनौती दी थी कि वो ‘अमेरिकी रिसर्च चुराने या बर्बाद करने’ संबंधी आरोपों के समर्थन में कोई सबूत पेश करें.

क्या है ये पूरा माजरा?
एक तरफ चीन ने आरोपों प्रत्यारोपों से कुछ हासिल न होने और वैक्सीन को मानवता के हित में इस्तेमाल किए जाने की बातें कही हैं तो दूसरी तरफ, जिस तरह अमेरिका और चीन के बीच जिस तरह की जियोपॉलिटिक्स जारी है, उससे इतना तो साफ है कि वैक्सीन के विकास का पूरा खेल मानवता के लिए नहीं बल्कि मुनाफे के लिए शुरू हो चुका है. संभव है कि शुरूआती समय में कोई भी कामयाब वैक्सीन वाकई मानवता के लिए इस्तेमाल होती दिखे भी, लेकिन मांग बढ़ते ही जल्द ही यह मुनाफा केंद्रित व्यापार का रूप ले ही सकती है.

नई दवाओं के गंदे खेल को समझना चाहिए
इस तरह की राजनीति और आरोपों को एक साज़िश की तरह इस्तेमाल किया जाता है और किसी वैक्सीन के प्रचार के लिए दूसरी वैक्सीन को बदनाम करने की तरकीबें मार्केटिंग का हिस्सा ही होती हैं. इसके अलावा दवा कंपनियां किस तरह के हथकंडों से मुनाफे संबंधी अपना उल्लू सीधा करती हैं, देखिए.

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1. कीमतों पर ढोंग : किसी भी नई दवा के पहले फेज़ ​के रिसर्च तक की लागत का 84% हिस्सा टैक्सदाताओं की रकम से सरकारी मदद के तौर पर कवर होता है. कंपनियां जितनी लागत बताती हैं, उसका करीब 39% ही वास्तविक खर्च होता है. मसलन, कंपनी कहती है कि एक नई दवा की लागत 1.32 अरब डॉलर आएगी तो उसकी वास्तविक लागत करीब साढ़े पांच करोड़ डॉलर ही होगी.

2. प्रचार हथकंडा : रिसर्च की तुलना में ढाई गुना ज़्यादा खर्च मार्केटिंग पर होता है और विज्ञापनों पर फार्मा कंपनियां भारी खर्च करती हैं.

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3. डॉक्टरों की लॉबिंग : ताकि डॉक्टर इस नई दवा को प्रमोट करें और प्रेस्क्रिप्शन में लिखें, इसके लिए फार्मा कंपनियां एक पूरा प्रबंधन तैयार कर अरबों खरबों रुपए सालाना खर्च करती हैं.

4. टेस्टिंग का रैकेट : अगर अमेरिका में कोई दवा तैयार हो रही है या अमेरिकियों के लिए तो भी उसकी टेस्टिंग दूसरे देशों में क्यों? अफ्रीका, भारत और एशिया के गरीब देशों में टेस्टिंग की लागत कम पड़ती है और जोखिम के लिहाज़ से भी इन देशों को चुना जाता है.

5. अन्य अनैतिकताएं : फार्मा कंपनियां इस तथ्य को छुपाती हैं कि वैक्सीन या नई दवाओं के फॉर्मूले में कितने घातक केमिकल्स या तत्वों को मिलाया जाता है. इसके अलावा, वास्तविक कीमत से कई गुना कीमत वसूल कर अरबों खरबों का हेरफेर होता है.





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