Home India News घातक हो सकती है कोरोना की वैक्सीन, खुद वैज्ञानिक देने लगे वॉर्निंग

घातक हो सकती है कोरोना की वैक्सीन, खुद वैज्ञानिक देने लगे वॉर्निंग


कोविड-19 का आंकड़ा अब 99 लाख से ज्यादा हो चुका है. ऐसे में तमाम देश इसी बात पर लगे हैं कि किसी तरह वैक्सीन बनकर तैयार हो जाए तो लोगों की जान बच सकेगी. कई देश एक के बाद एक वैक्सीन के ट्रायल (coronavirus vaccine trial) के दावे भी कर रहे हैं. इन सबके बीच अब एक और बात उठ रही है. वो ये कि कहीं वायरस के टीके में हड़बड़ाहट कोई दूसरी गंभीर मुश्किल न ला दे. खुद वैज्ञानिकों की बड़ी जमात मान रही है कि वैक्सीन तैयार हो जाने और उसके पूरी तरह से सुरक्षित होने में काफी फर्क है.

नतीजे जांचने में जरा भी लापरवाही हो तो लोगों की सेहत पर उल्टा असर हो सकता है. जैसा पोलियो के मामले में हुआ था, जिसे अमेरिका के मेडिकल इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से (initial polio vaccine was one of the worst biological disasters in American history) माना जाता है.

क्या हुआ था पोलियो के टीके का असर
तब पोलियो की बीमारी बुरी तरह से बच्चों को प्रभावित कर रही थी. इसे देखने हुए वैज्ञानिक टीका बनाने में जुटे. अमेरिकी वैज्ञानिक Jonas Salk को इसमें सफलता भी मिल गई. इसे मिरेकल ड्रग बोला गया. वैक्सीन को मार्केट में लाने से पहले इसका टेस्ट हुआ. टेस्ट करने वाली वैज्ञानिक Bernice E. Eddy को बर्कले की Cutter Laboratories का सैंपल लेकर बंदरों को टीका देने पर समझ आ गया कि टीके में कोई गड़बड़ी है. उन्होंने इसके लिए चेतावनी भी दी लेकिन उसे अनसुनी करके टीका 420,000 बच्चों को लगा दिया गया. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक इनमें से 40000 बच्चों पर टीका फेल हो गया. 51 बच्चे पैरालिसिस का शिकार हो गए और 5 बच्चों की मौत हो गई.

साल 1952 में अमेरिका में पोलिया का सबसे बड़ा आउटब्रेक हुआ था

किताब में भी दुर्घटना का जिक्र
इसका जिक्र फिलाडेल्फिया में वैक्सीन सेंटर के वैज्ञानिक Paul A. Offit ने अपनी किताब “The Cutter Incident” में भी किया था. तब अमेरिका में पोलियो का खौफ परमाणु बम के बाद सबसे ज्यादा था. ऐसा एक पोल में भी सामने आया था. तब किसी को ये पता नहीं था कि पोलियो होता क्यों है. इस वजह से लोग नॉर्मल जिंदगी जीने से डरने लगे थे. लोग मास्क में रहते और हाथ मिलाने से भी बचते.

ये भी पढ़ें: नेपाल में अब हिंदी पर बैन की तैयारी, जानिए, कितनी लोकप्रिय है वहां ये भाषा

वयस्कों को भी होता था पोलियो
साल 1952 में अमेरिका में पोलिया का सबसे बड़ा आउटब्रेक हुआ. इस दौरान 57,000 लोगों को संक्रमण हुआ. तब पोलियो से बचाने के लिए बच्चों की नाक में एसिड का स्प्रे होने लगा. इससे पोलियो तो ठीक नहीं होता था लेकिन बच्चों की सूंघने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो जाती थी. बच्चों ही नहीं, बड़ों को भी पोलियो होता. यहां तक कि अमेरिका के प्रेसिडेंट फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट को 39 साल की उम्र में पोलियो हुआ और वे कमर से नीचे से पैरालिसिस का शिकार हो गए.

ये भी पढ़ें – तिब्बत को लेकर भी चीन ने भारत को रखा था धोखे में, की थीं झांसे वाली बातें 

शुरू हुआ ट्रायल
साल 1951 में पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक Jonas Salk को पोलियो का टीका बनाने के लिए फंडिंग मिली. कुछ ही महीनों में उन्होंने दावा कर दिया कि टीका बन गया है. हड़बड़ी में वैक्सीन का ट्रायल हुआ. 420,000 बच्चों को ये दिया गया. वहीं एक बड़े ग्रुप को कोई दवा नहीं दी गई. तब दिखा कि जिन बच्चों को वैक्सीन नहीं मिली, उन्हें पोलियो की आशंका तिगुनी थी, बनिस्बत उनके जिन्हें टीका मिला.

टेस्ट करने वाली वैज्ञानिक Bernice E. Eddy ने गड़बड़ूी को लेकर चेताया भी लेकिन किसी ने नहीं सुनी (Phptp-pixnio)

एक कंपनी ने बनाई गलत दवा
नतीजे से वैक्सीन को पक्का मान लिया गया. अखबारों में खबरें छप गईं. और यही से गड़बड़ी की शुरुआत हुई. कई सारी दवा कंपनियों को वैक्सीन का लाइसेंस मिल गया. Cutter Laboratories भी इनमें से एक थी. इसी की वैक्सीन में गलतियां थीं. इसे टेस्ट करने वाली वैज्ञानिक Bernice E. Eddy ने गड़बड़ूी को लेकर चेताया भी लेकिन किसी ने नहीं सुनी. 165,000 वैक्सीन डोज “POLIO VACCINE: RUSH” लिखकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिए गए. कुछ ही हफ्तों में नकारात्मक रिपोर्ट्स आने लगीं. ये अप्रैल 1955 की बात है.

ये भी पढ़ें: क्यों भारत ने बांग्लादेश को 3 बीघा जमीन दे रखी है लीज पर 

70 हजार से ज्यादा लोग हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए. कई मौतें हुई. दो ही महीनों के भीतर वैक्सीन रोक दी गईं. दोबारा ट्रायल हुए. दोबारा सारे लैब्स की जांच हुई. इसके बाद ये मार्केट में आए.

कोरोना को लेकर भी यही डर
अब कोरोना वैक्सीन में जल्दबाजी देखते हुए यही डर जताया जा रहा है. इस बारे में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के लैंगोन मेडिकल सेंटर एंड बेलुवे हॉस्पिटल के डॉ. ब्रिट ट्रोजन कहते हैं कि अगर कोरोना वैक्सीन ने भी पोलियो का इतिहास दोहराया और लोगों का मेडिकल साइंस से भरोसा हट जाएगा. वैक्सीन के बनाने और उसके सौ फीसदी सेफ होने में काफी अंतर है. जैसे साल 2016 में डेंगू के लिए एक वैक्सीन Dengavxia तैयार करने की कोशिश की गई. लेकिन इसके कारण डेंगू प्रभावित लोगों की हालत और खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई.

वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि जल्दबाजी में लाई जाने वाली नई वैक्सीन की कई लिमिटेशन होंगी (Photo-pixabay)

नहीं बचाएगी इंफेक्शन से
खुद वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि जल्दबाजी में लाई जाने वाली नई वैक्सीन की कई लिमिटेशन होंगी. जैसे हो सकता है कि वे मरीज को मौत से बचा लें या गंभीर हालत से बचा सकें लेकिन बीमार होने से नहीं बचा सकेंगी. इसके भी कई खतरे हैं. जैसे वैक्सीन लेने के बाद लोग मान सकते हैं कि वे सेफ हैं और रुटीन में लौट सकते हैं. लेकिन भीड़ या संक्रमित लोगों के संपर्क में आने पर वे बीमार हो जाएंगे. इससे भ्रम और डर के हालात पैदा हो सकते हैं.

ये भी पढ़ें: गर्दन सीधी रहे, इसके लिए चीनी सैनिकों की कॉलर पर रहती है नुकीली पिन

बिना लक्षणों के लोग फैलाएंगे संक्रमण
सेंट लुइस में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक माइकल किंच के मुताबिक ऐसे हालात पैदा होने की काफी संभावना है. कोरोना के मामले में ये और भी खतरनाक इसलिए है क्योंकि पहले ही बिना लक्षणों के मरीजों के कारण संक्रमण लगातार फैल रहा है. ऐसे में अगर वैक्सीन ले चुके लोग कोरोना पॉजिटिव हुए और उनके लक्षण इतने माइल्ड रहे कि खुद उन्हें बीमारी का पता न चले तो ऐसे में वे बीमारी के वाहक का काम कर सकते हैं. यानी संक्रमण की दर और बढ़ सकती है.





Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments